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बुधवार, 18 नवंबर 2009

पत्रकारिता को मंडी तो सिर्फ निरंजन ही कह सकते

स्व.प्रभाष जोशी का खड़ाऊं लेकर मुंबई की सड़कों पर घूम रहे पूर्व पत्रकार निरंजन परिहार की भाषा में कुछ संयम जरूर दिखाई पड़ा, मगर लगता है अभी वो सुधरने वाले नहीं। जल्द ही उन्होंने अपनी सफाई में कुछ लिखा पढ़ी की है। उनका वही रटा-रटाया राग चल रहा है, जिसमें उन्होंने मीडिया को देह व्यापार की मंडी जैसे शब्द से नवाजा है। कहने को तो वे खुद को जाने-माने पत्रकार कहते हैं, लेकिन उन्हें जानने वाले अच्छी तरह से जानते हैं कि कितने बड़े पत्रकार हैं। अपने नाम के साथ मीडिया विशेषज्ञ लिखने वाले निरंजन को क्या पत्रकार लिखने में शर्म आती है। कोई उनसे पूछे तो सही कि आखिर पत्रकार क्यूं नहीं लिखते। और जब नहीं लिखते तो फिर इस जमात से ताल्लुक क्यों रखते हो। करोड़पति नेता के पीआरओ हो। खबरें छपाओ, जेब भरो मस्त रहो। फोकट में क्यूं पत्रकार बिरादरी को बदनाम करने पर तुले हो। मंडी और रंडी जैसे शब्दों का प्रयोग कर निरंजन ने फिर एक लेख कुछ वेबसाइट्स पर चलवाया है। जिसमें उन्होंने काफी हद तक इस बात को स्वीकार कर लिया है कि वे चुनाव में अखबारों का पैकेज करवाते थे। निरंजन के ही शब्दों में कहा गया है कि वो कभी खबर बेचते नहीं थे, खरीदते जरूर थे। लिखा है खबरों के लिए पैसे कहां- कहां दिये, अगर खुलासा कर दूं तो कई बेनकाब हो जाएंगे। साफ जाहिर है कि चुनाव के दौरान नेताओं की खबर छपवाने के लिए निरंजन ने भरपूर पैकेजबाजी की और जमकर नोट बनाई। लेकिन प्रभाषजी की श्रद्धांजलि सभा में जिस तरह पैकेज का विरोध कर रहे थे, उससे निरंजन बेपर्दा नजर आए। उनको बड़ी तकलीफ है नये पत्रकारों से। हर लेख में कहीं न कहीं नया नवेला पत्रकार आ ही जाता है। लोग नयी पीढ़ी को आगे लाने का प्रयास करते हैं और प्रभाषजी का ये चेला चाहता ही नहीं कि कोई नया व्यक्ति मीडिया में आए। पहरेदार की तरह युवाओं को मीडिया में आने से रोक रहे निरंजन की आज ये दुर्गति हो गई है कि उन्हें मुंबई का कोई अखबार छापता तक नहीं है। गये १० सालों से अखबारों से दूर निरंजन बीच में सहारा व एक अन्य छोटे चैनल में लगे थे, मगर वहां दोनों ही जगह उनके साथ क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है। कुछ साप्ताहिक- पाक्षिक अखबारों में इधर- उधर छप लिया करते थे। वहां भी दुकान बंद पड़ी है। अब तो नेट का ही सहारा है। खूब छप रहे हैं और उसी की आड़ में यहां पीआरशिप का धंधा भी मजेदार चल रहा है। वैसे खबरे बेचने का उनका कारोबार ठीक-ठाक है। कोई जलन नहीं है उनसे। मुंबई जैसे शहर में खाने के लिए कमाना तो पड़ेगा ही। लेकिन फिर ये तुर्रा नहीं होना चाहिए कि मैं खबरों का ठेकेदार नहीं। चुनाव के समय नेता और बरसात के महीने में जैन समाज $ के चातुर्मास निरंजन के लिए कमाऊ होते हैं। तमाम जैन साधु संत तो निरंजन के पक्के क्लाइंट हैं। हाल के विधानसभा चुनाव में मुंबई के अच्छे पीआरओ बन चुके निरंजन परिहार जब खुद को प्रभाषजी की परंपरा का वाहक बताते हैं, लोग हंसते हैं। कभी अपने वरिष्ठ हुआ करते थे। उनके बारे में इतना कुछ नहीं पता था, इसलिए लंबे समय तक उनको सलाम भी किया, लेकिन जैसे ही उनका यह पैकेजवान चरित्र दिखाई दिया, बड़ी नफरत हो गई उनसे। जब से उन्होंने पत्रकारिता के लिए मंडी- रंडी जैसे शब्दों का इस्तेमाल शुरु कर दिया, नजरों से गिर गये। और गिरे भी इतने कि आज उनके कारनामों पर लिखना पड़ रहा है। उन्होंने ने कहा था कि बात बढ़ेगी तो दूर तक जायेगी। ...जितने भी दूर जाओगे, पीछा नहीं छूटेगा निरंजन। तुमने अपशब्दों का प्रयोग कर सोचा था लोग डर कर पीछा छोड़ देंगे। लेकिन अब तो और भी लोग हमारे साथ इस अभियान में शामिल हो गये हैं। रही बात इस आरोप-प्रत्यारोप की तुम झूठे पुलिंदे चाहे जितने उछाल लो, अपने खिलाफ कुछ मिलने वाला नहीं तुम्हें। किसी भी तरह के तुम्हारे झूठे आरोपों से विचलित हुए बिना, इस अभियान को हम सबने जारी रखने का निश्चय किया है। फैसला तुम्हारे हाथ, कहां तक ले चलते हो....

2 टिप्‍पणियां:

prakash ने कहा…

खतरनाक चाचा अच्छी बैंड बजाई है.पढ के मजा आया....
लेकिन मैदान में कूदकर ललकारते हु पहली बार देख रहा हूं...
अच्छा है थोड़ा कचरा तो साफ होने ही चाहिए

viseshank ने कहा…

bat sach hai . par sach bole kon, aapane bola , likha or jordar likha. sac hai satprtishat.