Advt

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

बेटे-बेटियों की सक्रियता से नेताओं को मिली फुर्सत

महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव में अपनी पार्टियों को बढ़त दिलाने उतरे सभी नेताओं के पुत्रों और पुत्रियों ने मोर्चा संभाल लिया है, ताकि उनके पिता पूरे सूबे में घूम-घूम कर प्रचार कर सकें और उनकी सीट पर प्रचार सुचारु ढंग से चलता रहे। चुनाव प्रचार में लगे नेता पुत्रों में पहला नाम आता है आदित्य ठाकरे का, जो पार्टी की युवा इकाई के मुखिया भी है, ने मुंबई समेत राज्यभर में रैलियां करके शिवसेना के पक्ष में युवाओं को जोडऩे का अभियान  चला रखा है। इसी तरह कांग्रेस के चुनाव प्रचार की कमान संभाल रहे पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने भी अपने दोनों पुत्रों को कोंकण में लगा रखा है। निलेश राणे जो पूर्व सांसद हैं अपने अनुज और स्वाभिमान संगठन के अध्यक्ष नितेश राणे के साथ कोंकण के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और रायगढ़ जिले में कांग्रेस की ओर से व्यापक प्रचार अभियान छेड़े हुए हं। इस चुनाव में तो राज ठाकरे ने भी अपने पुत्र अमित को राजनीतिक प्रशिक्षण के लिए प्रचार में उतार दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे भले ही पूरे राज्य में पार्टी के प्रचार में लगे हों, लेकिन उनके पुत्र राहुल ठाकरे यवतमाल जिले में सक्रिय हैं। वैसे तो वरिष्ठ नेताओं की कई संतानों को चुनाव लड़ते हुए देखा जा रहा  है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे अमित लातूर में, तो  पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणिती सोलापुर में एवं भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की पुत्री पंकजा अपनी बहन प्रितम के साथ न सिर्फ अपने गृह जिले बीड में भाजपा की कमान संभाले हुए हैं, बल्कि पूरे राज्य में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी भी पार्टी नें पंकजा को सौंप रखी है। राकांपा अध्यक्ष शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले भी प्रदेश भर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों को जिताने के लिए सक्रिय हैं। वरिष्ठ राकांपा नेता विजयसिंह मोहिते पाटील के बेटे रणजीत सिंह भी लंबे समय से पिता की विरासत संभाले हुए हैं और इस चुनाव में उन्हें भी काफी सक्रिय देखा जा रहा है।  नंदुरबार राकांपा के दिग्गज नेता रहे पूर्व मंत्री विजय गावित, जो अभी भाजपा में हैं और पूरे जिले में पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उनकी सांसद पुत्री डॉ. हिना गावित ने पिता की सीट पर मोर्चा संभाल रखा है। स्थानीय स्तर पर अगर देखा जाए, तो मुंबई में पूर्व सांसद एकनाथ गायकवाड की बेटी जो पूर्व में राज्य की मंत्री रही हंै, इस बार भी धारावी से मैदान में हैं। इसी तरह नवी मुंबई राकांपा के वरिष्ठ नेता गणेश नाईक के बड़े बेटे पूर्व सांसद संजीव इस बार के चुनाव में बेलापुर से अपने पिता गणेश और छोटे भाई संदीप का ऐरोली में चुनाव प्रचार संभाल रहे है। ठाणे शहर से राकांपा के दिग्गज नेता वसंत डावखरे इस चुनाव में अपने बेटे निरंजन को टिकट दिलाने में कामयाब रहे है। जो ठाणे शहर सीट से एनसीपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैंं। वहीं शिवसेना विधायक प्रताप सरनाईक के पुत्रपूर्वेश भी माजीवड़ा- ओवला सीट पर अपने पिता को कामयाबी दिलाने के लिए प्रयत्नशील हैं। कुलाबा से भाजपा प्रत्याशी राज के. पुरोहित ने भी पुत्र आकाश को चुनावी जिम्मेदारी सौंप कर आगामी सियासत  के लिए तैयार होने का इंतजाम कर दिया है।  वसई- विरार के नेता हितेन्द्र ठाकुर का बेटा क्षितिज नालासोपारा से खुद चुनाव लड़ रहा है, तो भाईंदर से राकांपा प्रत्याशी गिल्बर्ट मेंडोसा की दो पुत्रियां  और एक पुत्र उनके चुनाव कार्य को संभाले हुए हैं। मेंडोसा की बड़ी बेटी केटलीन महापौर हैं, तो बेटा वेंचर और बेटी असेन्ला कार्पोरेटर हैं। दहिसर से शिवसेना के टिकट पर चुनाव लड़ रहे विनोद घोसालकर के प्रचार की कमान जहां उनके नगरसेवक पुत्र अभिषेक ने संभाल रखी है, वहीं दिंडोशी के विधायक राजहंस सिंह के पुत्र नितेश भी पिता की राजनैतिक विरासत को संभालते हुए चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। 
इस चुनाव में अपनी संतानों को काम पर लगाकर नेतागण जहां उनके प्रशिक्षण का इंतजाम कर दिये हैं, वहीं नेताओं को भी काफी राहत महसूस हो रही है और वे अपना क्षेत्र छोड़कर राज्य भर में दौरे करके प्रचार कर रहे हैं।

दक्षिण मुंबई में भाजपा के निशाने पर कांग्रेस, सेंध लगना तय

 संसदीय क्षेत्रवार चल रही चुनावी परिक्रमा में आज बात दक्षिण मुंबई की, जहां की तीन सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं। एक जगह बीजेपी का विधायक है, तो एनसीपी और मनसे के एक-एक विधायक हैं। किसी जमाने में भाजपा का मजबूत गढ़ रही इस संसदीय सीट पर कामगार नेता रहे जार्ज फर्नांडीज, कैलाश नरूला, सदाशिव पाटील, रतनसिंह राजदा, मुरली देवड़ा, जयवंतीबेन मेहता, मिलिंद देवड़ा आदि ने प्रतिनिधित्व किया है। वर्तमान में शिवसेना के अरविंद सावंत इस सीट पर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं। जिन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा से यह सीट छीनी है। कोलाबा से लेकर माहिम तक फैले इस संसदीय भूभाग पर कब्जा करने के लिए इस बार भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस इस कोशिश में है कि उसके विधायकों की संख्या न भी बढ़ सके तो जितने हैं कम से कम उतने तो बने रहें। एनसीपी भी अपनी वर्ली सीट बचाने को प्रयासरत है, तो मनसे ने शिवडी सीट फिर से हालिस करनेे के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। आइये शुरुआत करते हैं मलबार हिल विधानसभा सीट से, जहां १९९० में कांग्रेस के बीए देसाई जीते थे। उसके बाद से लगातार यह सीट भाजपा के खाते में जा रही है। यहां से प्रवासी भाजपा विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा चार बार विधायक रह चुके हैं। इस बार वे पांचवीं दफा मैदान में हैं। गत चुनाव में यहां लोढ़ा को जहां ५८ हजार से अधिक वोट मिले थे, वहीं कांग्रेस के राजकुमार बाफना को महज ३३ हजार के करीब मतों से संतोष करना पड़ा था। बाफना दूसरे पर रहे और मनसे के अर्चित जयेकर ने २५ हजार वोट हासिल कर तीसरी जगह बनाई थी। इस बार लोढ़ा पुन: जोर शोर से अपना वर्चस्व बरकारार रखने को मैदान में हैं। जिनके सामने शिवसेना के अरुण दुधवडकर बड़ी चुनौती के रूप में उभरे हैं। हालांकि कांग्रेस ने यहां सुशीबेन शाह के रूप कमजोर चेहरा उतारा है और राकांपा के नरेंद्र राणे भी चुनावी मुकाबले में नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में तय है कि यहां टक्कर भाजपा और सेना में ही होगी। दूसरी महत्वपूर्ण सीट है कुलाबा की, जो देवड़ा परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है। मुरली देवड़ा की करीबी एनी शेखर ने गत चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे राज के. पुरोहित को ८ हजार के करीब मतांतर से पराजित किया था। पिछले चुनाव में शेखर को ३९ हजार तथा पुरोहित को ३१ हजार वोट ही मिल पाये थे। मनसे के अरविंद गावड़े यहां २२ हजार वोट लेकर तीसरे पर थे। इस बार के चुनाव में जहां भाजपा के पक्ष में हवा है, वहीं शिवसेना का अलग लडऩा भगवा मतों का विभाजन करता है, जिससे यहां कांग्रेस फायदे में दिख रही है। कोलाबा सीट पर शेखर और पुरोहित के अलावा शिवसेना के पांडुरंग सकपाल, मनसे के अरविंद गावड़े और राकांपा के बशीर पटेल भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार मतदान के दो दिन पूर्व ही इस सीट का समीकरण साफ हो पाएगा। वैसे यहां कांग्रेस से भाजपा और शिवसेना दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवार बराबरी पर लड़ रहे हैं। मुंबा देवी सीट पर लगातार तीन बार विधायक रहे राज के. पुरोहित परिसीमन के बाद पिछले चुनाव में कोलाबा चले गये थे, तो मित्र पक्ष शिवसेना ने गत चुनाव में अनिल पडवल को उतारा था। जो २८ हजार वोटों तक ही सिमट गये थे। यहां ४५ हजार वोट पाकर कांग्रेस के अमीन पटेल विजयी घोषित किये गये थे। समाजवादी पार्टी के बशीर पटेल को गत चुनाव में महज १९ हजार वोट ही मिल पाये थे। इस बार के चुनाव में कांग्रेसी विधायक अमीन पटेल के सामने भाजपा ने अतुल शाह को उतारा तो है, लेकिन अतुल का चुनाव प्रचार अभी तक रंग नहीं पकड़ पाया है। वैसे शिवसेना की उम्मीदवार योगिंद्रा सालेकर के मैदान में होने से अतुल की राह और भी मुश्किल हो गयी है। इसी तरह भायखला सीट पर कांग्रेस के मधु चव्हाण विधायक हैं, तो उनके सामने भाजपा ने भी मधु चव्हाण को ही उतारा है। यहां शिवसेना का उम्मीदवार तो नहीं है, मगर अरुण गवली की बेटी गीता को सेना द्वारा समर्थन दिये जाने से भायखला की लड़ाई तिकोनी हो गयी है। शिवड़ी सीट पर मनसे के बाला नांदगावकर वर्तमान विधायक हैं। उनके सामने शिवसेना अजय चौधरी को उतारा है, तो भाजपा ने महिला मोर्चे की नेता शलाका साल्वी को उम्मीदवारी दी है। यहां मनसे और शिवसेना के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। वर्ली विधानसभा सीट से सचिन अहीर राकांपा के टिकट पर विधायक हैं। जिनके सामने भाजपा ने सुनील राणे को उतारा है, तो शिवसेना के टिकट पर सुनील शिंदे मैदान में हैं। क्षेत्र में सचिन की मजबूत पकड़ को भाजपा से तो चुनौती नहीं मिल रही है। हां, इतना जरूर है कि शिवसेना के सुनील शिंदे सचिन का विजय रथ रोकने के लिए पूरी ताकत लगा दिये हैं। दक्षिण मुुंबई में कांग्रेस के तीनों विधायकों के सामने भाजपा जिस रणनीति से उतरी है, यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि कांग्रेसी विधायकों की संख्या घटना तय है और यहां भाजपा की बढ़त भी निश्चित है। अब सवाल उठता है कि क्या मनसे और राकांपा का अस्तित्व यहां बचा रह पाएगा। इसके लिए हमें चुनाव परिणाम का इंतजार करना होगा। 

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

उत्तर पूर्व में संख्या बढ़ाने उतरी भाजपा, मनसे के लिए अस्तित्व का संकट

 महानगर की उत्तर पूर्व सीट का इतिहास-भूगोल शुरू से बड़ा अजीब रहा है। यहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता हसू आडवाणी, प्रमोद महाजन, जयवंतीबेन मेहता, प्रकाश मेहता और सरदार तारासिंह ने सियासत की लम्बी पारी खेली है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत भी इसी सीट से पहले सांसद हुआ करते थे। यहां की अलग-अलग विधान सभा क्षेत्रों में कहीं गुजराती तो कहीं पर मराठियों का बाहुल्य है। किसी इलाके में सिंधी तो कहीं अल्पसंख्यक मुसलमानों का बाहुल्य है। इस क्षेत्र की दो विधानसभाओं पर वत्र्तमान में भाजपा का कब्जा है, तो तीन सीटें मनसे के कब्जें में रहीं। एक सीट पर समाजवादी पार्टी का विधायक गत चुनाव में जीता था।  
सबसे पहले ठाणे शहर की सीमा से सटी मुलुंड विधान सभा सीट पर चर्चा करते हैं। यहां बीजेपी के सरदार तारा सिंह लम्बे समय से कब्जा जमाये हुए हैं। यहां 2004 में सरदार को 90 हजार वोट मिले थे, तो 2009 में उनके मत घट कर 65 हजार हो गए थे। तारा सिंह के मतों के घटने का क्रम गत चुनाव की तरह ही जारी रहा तो इस बार यहां बीजेपी को बड़ी मुश्किल हो जाएगी। यहां सरदार तारा सिंह के विजय रथ को रोकने के लिए कांग्रेस ने जहां अपने पूर्व एमएलसी चरणसिंह  सप्रा को उम्मीदवारी दी है, वहीं शिवसेना ने प्रभाकर शिंदे को उतार कर इलाके के मराठी मतों को साधने की कोशिश की है। राकांपा के टिकट पर नंदकुमार वैती और मनसे की तरफ से सत्यवान दलवी मैदान में हैं। इस सीट पर सरदार तारा सिंह का सामना या तो चरणसिंह सप्रा से होगा या फिर शिवसेना के प्रभाकर शिंदे से उनकी टकराहट होगी। हिंदीभाषियों के साथ ही इस इलाके में मराठी और सिंधी लोगों की संख्या बहुतायत है। अब बात विक्रोली सीट की, जहां से रांकापा ने अपने पूर्व सांसद संजय दीना पाटील पर दांव लगाया है। मनसे के वर्तमान विधायक मंगेश सांगले, शिवसेना सांसद संजय राऊत के अनुज सुनील राऊत शिवसेना के टिकट पर और कांग्रेस की ओर से संदेश म्हात्रे मैदान में हैं। यहां भाजपा का उम्मीदवार नहीं है। इस सीट पर गठबंधन के मित्र दल आरपीआई ने विवेक पंडित को टिकट दिया है। यह सीट राकांपा के लिए जितनी प्रतिष्ठापरक है, उससे कहीं ज्यादा मनसे के लिए । राकांपा अपने पूर्व सांसद को उतारकर यहां कब्जा जमाना चाह रही है, तो मनसे अपनी विधायकी बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इस सीट पर गत चुनाव में तत्कालीन सांसद संजय पाटिल की पत्नी पल्लवी राकांपा की प्रत्याशी थी, जिनको मनसे उम्मीदवार मंगेश सांगले ने बड़े अंतर से पराजित किया था। अब संजय पाटिल के सामने पत्नी की हार का बदला लेने की बड़ी चुनौती है। घाटकोपर पूर्व की सीट गुजराती बाहुल्य है। यहां गुजराती-मारवाड़ी जैनों के ४५ हजार से अधिक वोट हैं। इसी के सहारे भाजपा के प्रकाश मेहता गत कई चुनावों से जीतते आ रहे हैं। इस बार कांग्रेस ने उनके सामने प्रवीण छेड़ा के रूप में जैन प्रत्याशी उतार दिया है। जगदीश चौधरी यहां शिवसेना का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो सतीश नारकर मनसे के टिकट पर उतरे हैं। राकांपा ने नगरसेविका राखी जाधव को टिकट दिया है। स्थितियों को देखकर यही लगता है कि यहां प्रकाश मेहता और प्रवीण छेड़ा के बीच में ही मुकाबला होगा। भांडुप पश्चिम सीट पर मनसे के शिशिर शिंदे वर्तमान में विधायक हैं और फिर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उनका सामना भाजपा के मनोज कोटक, शिवसेना नगरसेवक अशोक पाटिल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण राणे समर्थक श्याम सावंत से होना है। आरपीआई ने गठबंधन धर्म तोड़ते हुए यहां अनिल गागुर्डे को बतौर निर्दलीय उम्मीदवार उतारा है। इस सीट पर मनसे और शिवसेना में टक्कर देखी जा रही है। घाटकोपर पश्चिम सीट पर मनसे के रामकदम गत चुनाव में जीते थे, जो अब भाजपा के हो लिए हैं। कदम की जगह मनसे ने उन्हें चुनौती देने के लिए अपने नगरसेवक व विभागीय अध्यक्ष दिलीप लांडे को उम्मीदवारी दी है। शिवसेना के सुधीर मोरे और कांग्रेस के रामगोविंद यादव भी इस सीट पर मैदान में हैं। राकांपा के नगरसेवक हारुन खान भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां राम कदम या तो मनसे से टकराएंगे या फिर उनका मुकाबला शिवसेना से होगा। मानखुर्द शिवाजी नगर की सीट मुस्लिम बाहुल्य मानी जाती है। ९० के दशक में यहां शिवसेना का कब्जा हुआ करता था। परिसीमन के बाद गोवंडी इलाका इस क्षेत्र में समाहित हो गया, जिससे यहां अल्पसंख्यक मतदाता ज्यादा हो गये हैं। इस सीट पर सपा के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी वर्तमान में विधायक हैं। उनके सामने कांग्रेस ने यूसुफ अब्राहनी को उतारा है। शिवसेना ने पूर्व नगरसेवक बुलेट पाटिल को टिकट दिया है। भाजपा की ओर से शनीम बानू मैदान में हैं। मनसे ने सुहैल अशरफ को उतारा है तथा इस सीट पर ओवैसी की पार्टी का उम्मीदवार भी मैदान में है। यहां भाजपा की हालत सबसे कमजोर है। पार्टी ने जिस शनीम को टिकट दिया है, वो गत लोकसभा चुनाव में निर्दलीय लड़ी थी और हजार के भीतर ही वोट पा सकी थी। अब भाजपा ने शनीम पर दांव लगाकर घाटे का सौदा किया है। इस संसदीय सीट पर पहले से मनसे के तीन विधायकों में अब दो बचा है। चुनाव परिणाम के बाद देखना है ये दोनों कायम रहते हैं या संख्या घटती है। सपा की एक सीट भी यहां खतरे में लग रही है। भाजपा के दोनों वर्तमान विधायक मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं। संभव है राम कदम के रूप में भाजपा को एक और विधायक मिल जाए।       

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

दक्षिण मध्य मुंबई में निर्णायक होंगे भूमिपुत्र मतदाता

लगातार दो बार से कांग्रेस के सांसद रहे एकनाथ गायकवाड़ को हराकर शिवसेना ने भले ही दक्षिण मध्य संसदीय सीट पर कब्जा जमा लिया है, लेकिन विधानसभा चुनाव में यहां कांग्रेस की स्थिति ठीक ठाक लग रही है। इतना जरूर है कि लोकसभा क्षेत्र की बहुत सी सीटें मराठी बाहुल्य हैं। अगर भूमिपुत्र मतदाता एकजुट हुए तो इस क्षेत्र में शिवसेना का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। दक्षिण मध्य संसदीय क्षेत्र में चेंबूर में कांग्रेस के चंद्रकांत हंडोरे विधायक हैं, तो अणुशक्ति नगर सीट से राकांपा के नवाब मलिक गत चुनाव में जीते हुए थे। धारावी सीट पर कांग्रेस की वर्षा गायकवाड तथा सायन कोलीवाड़ा से कांग्रेस के ही जगन्नाथ शेट्टी निवर्तमान विधायक हैं। इसी तरह वडाला सीट भी कांग्रेस के खाते में हैं, जहां से कालिदास कोलंबकर विधायक हैं और माहिम विधानसभा क्षेत्र पर मनसे का कब्जा है। यहां से नितिन सरदेसाई पिछले चुनाव में जीते थे। क्षेत्र की ६ विधानसभा सीटों में से ४ पर जहां कांग्रेस काबिज है, वहीं एक सीट मनसे के खाते में है तथा एक सीट पर राकांपा को जीत मिली थी। अब अगर इस चुनाव की बात करें, तो बदले हुए समीकरणों के साथ सभी दलों की निगाहें यहां के बहुसंख्य मराठी मतदाताओं पर लगी है। सबसे पहले नजर डालते हैं चेंबूर सीट पर, जो बौद्ध बाहुल्य मानी जाती है। यहां से कांग्रेस का दलित चेहरा माने जाने वाले चंद्रकांत हंडोरे लगातार दूसरी बार विधायक हैं। हंडोरे के सामने शिवसेना ने प्रकाश फातफेकर को उम्मीदवारी देकर दलित मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया है।  भाजपा की ओर से यह सीट गठबंधन के तहत आरपीआई को दी गई है। आरपीआई के टिकट पर यहां से माफिया डान छोटा राजन के भाई दीपक निखालजे प्र$त्याशी हैं। यहां देखना यह है कि दलित मतदाताओं का झुकाव किस तरफ होता है। वैसे अगर दलित वोट हंडोरे और निखालजे में बंटे और मराठी मतदाता एकजुट रहे, तो यहां बाजी शिवसेना के हाथ लग सकती है। इसके बगल की सीट अणुशक्ति नगर से वर्तमान राकांपा विधायक और पार्टी के प्रवक्ता नवाब मलिक फिर से मैदान में हैं। जिनके सामने शिवसेना ने तुकाराम काते को उतारा है और भाजपा के टिकट पर संदीप असोलकर मैदान में हैं। यहां राकांपा और शिवसेना में कांटे की टक्कर के बावजूद मलिक की स्थिति ठीकठाक लग रही है। इस सीट पर सबकुछ निर्भर करता है मराठी मतदाताओं पर । उनका एकमुश्त झुकाव जिधर हुआ, विजयश्री उसी खेमे की होगी। क्षेत्र की एकमात्र सुरक्षित सीट है धारावी की, जहां से पूर्व मंत्री वर्षा गायकवाड़ कांग्रेस के टिकट पर तीसरी बार मैदान में हैं। वर्षा पूर्व सांसद एकनाथ गायकवाड़ की बेटी हैं और दो बार विधायक रह चुकी हैं। उनके सामने भाजपा ने नगरसेविका दिव्या ढोले को उतारा है। शिवसेना के टिकट पर पूर्व विधायक बाबूराव माने मैदान में हैं। यहां वर्षा और बाबूराव के बीच जोरदार मुकाबला होने की संभावना है। सायन कोलीवाड़ा विधानसभा सीट पर कांग्रेस के विधायक जगन्नाथ शेट्टी फिर से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उनके सामने शिवसेना के मंगेश साटनकर और भाजपा नगरसेवक तमिल शेलवन मैदान में हैं। यहां शेट्टी और साटनकर के बीच रोचक मुकाबला देखा जा रहा है। इसी तरह वडाला सीट पर कांग्रेस के विधायक कालिदास कोलंबकर फिर से मैदान में उतरे हैं। कोलंबकर किसी जमाने में शिवसेना के कद्दावर विधायक माने जाते रहे हैं, जो नारायण राणे के साथ कांग्रेस में शामिल हुए थे और शिवसेना की विधायकी से इस्तीफा देकर उप चुनाव में कांग्रेस के बैनर तले फिर से विधायक चुने गये। इस बार कोलंबकर का सामना शिवसेना के हेमंत डोके और भाजपा के मिहिर कोटेचा से होना है। यहां भी कांग्रेस और शिवसेना में ही भिड़ंत होती दिख रही है। लेकिन सारा दारोमदार मराठी वोटर्स पर निर्भर करेगा। अब बात माहिम विधानसभा सीट की, जहां से मनसे के निवर्तमान विधायक नितिन सरदेसाई के सामने शिवसेना के सदा सरवणकर मजबूती के साथ प्रचार में जुटे हैं। भाजपा ने इस सीट पर विलास अंबेकर को उतारा है। कांग्रेस के दो बागी हेमंत नंदपल्ली और संदीप कटके ने नामांकन करके कांग्रेस प्रत्याशी को चुनाव से पहले ही कमजोर कर दिया है। गत चुनाव में यहां सदा सरवणकर कांग्रेस के टिकट पर उतरे थे। उस समय वे राणे के साथ शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में गये थे। इस बार पुन: अपने घर (शिवसेना) में आकर विधानसभा चुनाव में न सिर्फ किस्मत आजमा रहे हैं, बल्कि मनसे के कद्दावर नेता नितिन सरदेसाई को जोरदार टक्कर भी दे रहे हैं। दक्षिण मध्य मुंबई संसदीय सीट का गहन अध्ययन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि यहां से मराठी मतदाताओं को जो भी अधिक से अधिक खींच लेगा, उसके ही ज्यादा विधायक चुने जाएंगे। 

उत्तर मध्य मुंबई में कब्जा है कांग्रेस का, भाजपा को छूट रहा पसीना

विले पार्ले, कुर्ला, कलिना, बांद्रा पूर्व-पश्चिम और चांदिवली विधानसभाओं में बंटा हुआ है मुंबई का उत्तर मध्य संसदीय क्षेत्र, जहां फिलहाल तो कांग्रेस का ही कब्जा है। सिर्फ बांद्रा पूर्व की एक सीट शिवसेना के पास है। इस पूरे संसदीय क्षेत्र में सुनील दत्त के समय से लेकर प्रिया दत्त तक कभी किसी की दाल नहीं गली, मगर हाल के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर का फायदा उठाते हुए पूनम महाजन ने यहां भगवा फहरा दिया। इस प्रमुख संसदीय सीट में भाजपा का एक भी विधायक नहीं है, जबकि यहां से पार्टी ने एक से एक चेहरे उतारे हैं। जिन्हें चुनाव प्रचार के दौरान कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ रहा है।  लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता से बांछे खिलाये भाजपाई इस बार भी जोर शोर से उतरे तो हैं, लेकिन एकाध सीट को छोड़ दें, तो कहीं से भी भाजपा को मजबूत स्थिति में नहीं देखा जा रहा है। इलाके की सबसे महत्वपूर्ण सीट है कलिना, जो सांताक्रुज पूर्व से लेकर कुर्ला तक फैली हुई है। यहां से कांग्रेस ने पूर्व गृहराज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह को उतार कर अपना कब्जा बरकार रखने का प्रयास किया है। गत चुनाव में यहां मनसे के श्रीकांत मोरे दूसरे स्थान पर रहे। मोरे इस बार भी मैदान में डटे हैं। शिवसेना ने अपने वरिष्ठ नगरसेवक संजय पोतनिस को उम्मीदवारी दी है। भाजपा के टिकट पर उत्तर भारतीय चेहरे के रूप में अमरजीत सिंह को उतारा गया है। यहां कृपा और अमरजीत के बीच टक्कर संभावित है। यह भी हो सकता है कि दोनों सिंहों की लड़ाई का फायदा किसी भूमि पुत्र को मिल जाय। दूसरी अहम सीट है चांदिवली। जो अंधेरी पूर्व के साकीनाका, पवई और मरोल आदि विस्तारों को समेटे हुए है। यह सीट इस लिए भी खास मानी जाती है कि यहां से मुंबई उप नगर के पालक मंत्री नसीम खान कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। यहां भाजपा लड़ाई से पहले ही आउट हो गयी है। भाजपा के घोषित उम्मीदवार सीताराम तिवारी नामांकन के साथ बराबर शपथ पत्र नहीं लगाये थे, जिस वजह से तिवारी का नामांकन खारिज हो गया और भाजपा बिना लड़े ही रिंग से बाहर हो गयी। यहां शिवसेना ने युवा उत्तर भारतीय नेता संतोष सिंह पर दांव लगाया है, जो उत्तर भारतीय संघ अध्यक्ष आर.एन. सिंह के सुपुत्र हैं। मनसे की ओर से इस सीट पर ईश्वर तायड़े मैदान में हैं। यहां भी दोनों उत्तर भारतीय प्रत्याशियों के बीच सीधी टक्कर देखी जा रही है। नसीम खान और संतोष सिंह दोनों ही मुंबई की राजनीति में हिंदी भाषी चेहरा हैं। अब बात विले पार्ले की, जहां कांग्रेस के वर्तमान विधायक कृष्णा हेगड़े के सामने भाजपा ने पूर्व नगरसेवक पराग अलवणी को मैदान में उतारा है। पराग पूर्व में भी इस सीट पर भाजपा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन जीत नहीं पाये थे। इस बार पूर्व विधायक अभिराम सिंह राकांपा छोड$़कर भाजपा में आ गये हैं, जिससे पराग को ताकत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण सीट है बांद्रा पश्चिम की, जहां पार्टी ने मुंबई अध्यक्ष आशीष शेलार को उतारा है, जिनका सामना होगा कांग्रेसी विधायक बाबा सिद्दीकी से। बाबा की जड़े यहां काफी गहरी मानी जाती हैं। इसके बावजूद मोदी के नाम का सहारा लेकर शेलार मैदान में डटे हुए हैं। शिवसेना ने इस सीट पर शशिकांत पराडकर को उतार कर माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया है, लेकिन क्षेत्र में मराठी मतदाताओं की कमी शिवसेना को जरूर खलेगी। मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष जनार्दन चांदुरकर इसी इलाके की बांद्रा पूर्व सीट से मैदान में हैं, जो शिवसेना के वर्तमान विधायक बाला सावंत से टकराएंगे। भाजपा ने यहा खार पूर्व के नगरसेवक महेश पारकर को टिकट दिया है। अगर पारकर ने अच्छी बढ़त हासिल की, तो निश्चित ही शिवसेना कमजोर होगी और बाजी चांदुरकर के पक्ष में जा सकती है। कुर्ला सीट पर किसी भी पार्टी ने कद्दावर चेहरा नहीं उतारकर इसे उपेक्षित कर दिया है। यहां राकांपा के मिलिंद कांबले, भाजपा के विजय कांबले, शिवसेना के मंगेश कुराडकर और कांग्रेस के बीजी शिंदे मैदान में हैं, लेकिन इनमें से एक भी ऐसा चेहरा नहीं है, जो अभी चुनावी हवा को अपने पक्ष में करता दिख रहा हो। उत्तर मध्य संसदीय सीट के अध्ययन से एक बात सामने आयी है कि यहां कांग्रेस व भाजपा ने जहां अपने मुंबई अध्यक्षों को उतारा है, वहीं कृपाशंकर और नसीम खान जैसे दिग्गज कांग्रेसी भी मैदान में हैं। यहा रोचक मुकाबलों के बीच यह कह पाना मुश्किल लग रहा है कि कांग्रेस का यह मजबूत गढ़ बचा रहेगा या नहीं, लेकिन यह भी सही है कि क्षेत्र में भाजपा को खाता खोलने में कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। परिणाम जो भी हो, लेकिन बड़े चेहरों की वजह से उत्तर मध्य संसदीय सीट पर पूरे मुंबई की निगाहें लगी हुई हैं।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

उत्तर-पश्चिम मुंबई में खाता खोलने को बेताब भाजपा, मगर उम्मीद न के बराबर

 मालाड से लेकर विले पार्ले तक फैले उत्तर-पश्चिम संसदीय क्षेत्र की ६ विधानसभाओं में चार पर जहां कांग्रेस काबिज है,वहीं दो सीटों पर शिवसेना के विधायक हैं। इस क्षेत्र में खाता खोलने के लिए भाजपा ने पूरा जोर तो लगाया है, लेकिन ऐसे चेहरे उतारे गये हैं, जिनमें से किसी की भी नैया पार होती नहीं दिख रही है। शुरुआत दिंडोशी से करते हैं। यह इलाका मालाड पूर्व से शुरू होकर गोरेगांव और जोगेश्वरी पूर्व तक विस्तारित है। पिछले चुनाव में यहां से कांग्रेस के राजहंस सिंह विधायक चुने गये थे और शिवसेना के टिकट पर उतरे पूर्व महापौर सुनील प्रभु दूसरे पर थे। ये दोनों ही उम्मीदवार इस बार भी मैदान में हैं। इस बार मनसे ने शालिनी ठाकरे और भाजपा ने ज्वेलर मोहित कंबोज को टिकट दिया है। कंबोज मुंबई भाजपा के उत्तर भारतीय चेहरा माने जाते हैं। मोहित के साथ तकलीफ की बात यह है कि उनके साथ स्थानीय भाजपाई जुड़ नहीं पा रहे, जिस वजह से पूरा चुनाव राजहंस सिंह और सुनील प्रभु के बीच सिमट गया है। राजहंस और प्रभु दोनों ही लंबे समय से पालिका में नगरसेवक रहे और इलाके पर उनकी मजबूत पकड़ है। इस वजह से इन दोनों के बीच कांटे की टक्कर है। यहां कोई चमत्कार ही कंबोज को तीसरे से ऊपर ला सकता है। गोरेगांव पश्चिम सीट पर शिवसेना के दिग्गज नेता सुभाष देसाई विधायक हैं। गत चुनाव में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन के शरद राव से उनका सामना हुआ था। जिसमें भारी मतों के अंतर से देसाई को जीत मिली थी। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपने युवा नेता समीर देसाई को इस सीट पर उतारा है, तो भाजपा ने पूर्व उप महापौर विद्या ठाकुर को प्रत्याशी बनाया है। तीनों ही उम्मीदवारों की तुलना की जाय तो सुभाष देेसाई का कद एवं उनका जनाधार कांग्रेस और भाजपा पर भारी पड़ता दिख रहा है। जोगेश्वरी और अंधेरी पूर्व के कुछ हिस्से को मिलाकर बनी है जोगेश्वरी पूर्व विधानसभा सीट। यहां शिवसेना के रवींद्र वायकर विधायक हैं। उन्होंने कांग्रेस के कामगार नेता भाई जगताप को बड़े मतों के अंतर से पराजित किया था। इस चुनाव में वायकर के सामने भाजपा ने अपनी नगरसेविका उज्ज्वला मोडक को टिकट दिया है। कभी भाजपाई रहे पूर्व उप महापौर राजेश शर्मा इस सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। यहां मनसे ने भी अपने नगरसेवक आंब्रे को टिकट दिया है। अगर आंब्रे ने अच्छा प्रदर्शन किया, तो वे वायकर के लिए न सिर्फ मुसीबत खड़ी कर सकते हैं, बल्कि भाजपा या कांग्रेस की जीत का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा। यहां अभी तक भाजपा व कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर आने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं। अंधेरी पूर्व सीट पर कांग्रेस के सुरेश शेट्टी लगातार तीसरी बार विधायक हैं।  लंबे समय से मंत्री भी हैं। समझौते में यह सीट भाजपा ने अपने मित्र पक्ष आरपीआई को दे रखी है। पहले आरपीआई के टिकट पर मुठभेड़ विशेषज्ञ पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा उतरना चाह रहे थे, लेकिन कानूनी पचड़े में फंस जाने के कारण उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया है। अब यहां लड़ाई सुरेश शेट्टी और शिवसेना प्रत्याशी रमेश लटके के बीच होनी है। यह सीट उत्तर भारतीय बाहुल्य मानी जाती है। अंधेरी पश्चिम सीट भी कांग्रेस के ही विधायक अशोक जाधव के कब्जे में है। यहां शिवसेना ने यूनियन नेता जयवंत परब को टिकट दिया है। भाजपा के दिवंगत ने गोपीनाथ मुंडे के सहायक रहे अमित साटम भाजपा के टिकट पर उतरे हैं। अमित पार्टी के युवा नगरसेवक हैं। जबकि जयवंत जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ रखते हैं। अब देखना है ये दोनों ही उम्मीदवार क्या अशोक जाधव को शिकस्त दे पाते हैं ? इस बात को वक्त पर छोड़ कर हम चर्चा करते हैं वर्सोवा विधानसभा की । जो जोगेश्वरी व अंधेरी पश्चिम इलाके में फैली हुई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुनील दत्त के करीबी रहे बलदेव खोसा इस सीट पर दो बार से विधायक हैं। खोसा की किस्मत ही कहा जाएगा कि यहां से शिवसेना की घोषित प्रत्याशी राजुल पटेल का नामांकन खारिज हो गया। भाजपा ने भी इस इलाके में कोई खास चेहरा नहीं उतारा है। डॉ. भारती लवेकर यहां भाजपा के टिकट पर उतरी हैं, जो काफी अंजान सी उम्मीदवार हैं। पूर्व नगरसेवक व मुंबई राकांपा के अध्यक्ष रह चुके प्रवासी नेता नरेंद्र वर्मा यहां राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं। यहां वर्मा और खोसा के बीच सीधी टक्कर संभावित है। मनसे ने भी इस सीट पर बिल्डर लस्करिया को टिकट दिया है, जिनका सियासी वजूद तो नहीं है, मगर मनसे के परंपरागत मराठी वोट लस्करिया के खाते में जा सकते हैं। इस संसदीय सीट के सर्वेक्षण में एक बात सामने आई है कि यहां अभी तक भाजपा का एक विधायक नहीं है और कोई जीतता हुआ भी नहीं लग रहा।  वैसे भाजपा ने इस इलाके में खाता खोलने के लिए पूरा जोर लगा रखा है।  देखते हैं कामयाबी कहां तक मिलती है। 

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

'मेहमानों' को मिले टिकट, पालघर के शिवसैनिक नाराज

चुनावी परिक्रमा में आज का फोकस नव सृजित जिले पालघर पर। जहां वसई-विरार के इलाके को छोड़ दें, तो पूरा क्षेत्र शिवसेना या भाजपा के बाहुल्य वाला है। नगरीय क्षेत्रों को छोड़ दें, तो पूरा इलाका आदिवासियों का है। इसी लिए आरएसएस की इकाइयां इस क्षेत्र में बहुतायत कार्यरत हैं। यही कारण है कुछ चुनावों को छोड़ दें, तो यहां भाजपा के ही सांसद चुने जाते रहे हैं। कई स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों पर शिवसेना का कब्जा है। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में शिवसेना द्वारा बाहर से आये उम्मीदवारों को टिकट दे देने से स्थानीय शिवसैनिक न सिर्फ नाराज हैं, बल्कि इसका दुष्परिणाम भी सामने आ सकता है। चर्चा करते हैं जिले की विधानसभा सीटों की, जहां से शिवसेना को काफी उम्मीदें थी, लेकिन नेतृत्व ने टिकट वितरण में उम्मीदवारों का सही चयन नहीं किया, जिस वजह से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में खासी नाराजगी है। जिला मुख्यालय की पालघर सीट पर शिवसेना ने तीन बार विधायक रह चुके कृष्णा घोड़ा को टिकट दिया है। जिनसे स्थानीय कार्यकर्ता जुड़ नहीं पा रहे हैं। इसका कारण है कि घोड़ा अभी तक राकांपा में थे। शिवसेना में आये और लगे हाथ टिकट भी ले लिया, जिससे उनके साथ प्रचार में शिवसैनिक न के बराबर दिखाई दे रहे हैं। यहां कांग्रेस के टिकट पर वर्तमान विधायक व पूर्व मंत्री राजेंद्र गावित, भाजपा के डॉ. गौड़ और हितेंद्र ठाकुर की पार्टी से मनिषा निमकर को उम्मीदवारी मिली है। आखिरी समय तक अगर शिवसेना हाई कमान द्वारा स्थानीय कार्यकर्ताओं को समझाया नहीं गया, तो पार्टी को न सिर्फ नुकसान होगा, बल्कि शिवसेना प्रत्याशी कृष्णा घोड़ा तीसरे पर भी जा सकते हैं। ऐसे में वहां कांग्रेस के गावित और आघाड़ी की मनिषा के बीच सीधा मुकाबला संभावित है। जिले की दूसरी महत्वपूर्ण सीट है बोईसर, जहां कमलाकर दलवी शिवसेना के टिकट पर मैदान में हैं। उनके सामने बहुजन विकास आघाड़ी के वर्तमान विधायक विलास तरे, भाजपा के जगदीश घोड़ी, शिवसेना के बागी सुनील धानवे और कांग्रेस के टिकट पर मड़वी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां भी जिस कमलाकर दलवी को सेना ने उतारा है, वो चुनाव से पूर्व राकांपा के कद्दावर नेता रहे और पिछले हर चुनाव में शिवसेना का जमकर विरोध किये हैं। इस वजह से स्थानीय शिवसैनिक उनके साथ नहीं हो पा रहे हैं। यही हालात दहाणु सीट के भी हैं, जहां शिवसेना ने राकांपा से आये शंकर नम पर दांव लगाया है। इसके पहले के सभी चुनावों में पूर्व सेना जिला प्रमुख उदय बंधु पाटिल के निर्देश पर शंकर नम हमेशा शिवसैनिकों को ही नीचा दिखाते रहे। अब अचानक उनको टिकट मिल गया है, तो पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताचुनाव में सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। विक्रमगढ़ सीट जहां पूर्व में वर्तमान सांसद चिंतामण वनगा विधायक रहे, वहां भाजपा ने विष्णु सावरा पर भरोसा जताते हुए उम्मीदवारी दी है, तो शिवसेना ने प्रकाश निकम पर दांव लगाया है। इस सीट पर राकांपा ने सुनील भूसरा को टिकट दिया है। भाजपा की मजबूत जनाधार वाली इस सीट पर शिवसेना और राकांपा उम्मीदवारों को कड़ी मशक्कत करके अपनी जमानत बचानी होगी। शहरी क्षेत्रों में नालासोपारा और वसई की सीटें आती हैं, जहां वसई में शिवसेना-भाजपा समर्थित विवेक पंडित के सामने स्थानीय क्षत्रप हितेंद्र ठाकुर मैदान में हैं, तो नालासोपार वर्तमान विधायक क्षितिज ठाकुर को भाजपा के राजननाईक से कड़ी चुनौती मिल रही है। कुल मिलाकर जिले के चुनावी परिदृष्य पर नजर डालें तो निश्चित ही यहां शिवसेना ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन कर सकती थी, मगर बाहर से आये 'मेहमानÓ उम्मीदवारों को उतार कर पार्टी ने पुराने शिवसैनिकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। दूसरी तरफइलाके मेंचर्चा है डॉ. सुहास शंखे के इशारे पर इतनी भारी संख्या में दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को शिवसेना का टिकट दिया गया है। इसके लिए उद्धव ठाकरे के पीए मिलिंद नार्वेकर के साथ मजबूत सेटिंग की गई है। शिवसेना के तालुका प्रमुख सुधीर तामोरे कहते हैं कि पार्टी ने जिसे भी टिकट दिया है, उसके लिए काम करना सभी शिवसैनिकों का धर्म है। इस बारे में पूर्व शिवसेना जिला प्रमुख प्रभाकर राऊत कहते हैं कि दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओंको टिकट देने का फैसला पार्टी नेतृत्व द्वारा लिया गया है। इस बात को लेकर कार्यकर्ताओं में नाराजगी जरूर है, लेकिन जल्दी ही सबकुछ ठीक कर लिया जाएगा और सारे कार्यकर्ता शिवसेना उम्मीदवारों की जीत के लिए सक्रिय हो जाएंगे।